दिखलाए ख़ुदा उस सितम-ईजाद की सूरत इस्तादा हैं हम बाग़ में शमशाद की सूरत याद आती है बुलबुल पे जो बे-दाद की सूरत रो देता हूँ मैं देख के सय्याद की सूरत आज़ाद तेरे ऐ गुल-ए-तर बाग़-ए-जहाँ में बे-जाह-ओ-हशम शाद हैं शमशाद की सूरत जो गेसू-ए-जानाँ में फँसा फिर न छुटा वो हैं क़ैद में फिर ख़ूब है मीआद की सूरत खींचेंगे मेरे आईना रुख़सार की तस्वीर देखे तो कोई मानी ओ बहज़ाद की सूरत गाली के सिवा हाथ भी चलता है अब उन का हर रोज़ नई होती है बे-दाद की सूरत किस तरह 'अमानत' न रहूँ ग़म से मैं 'दिल-गीर' आँखों में फिरा करती है उस्ताद की सूरत