घोर घावों-से फटे अभावों में भी उत्सवी भवों को जीने का मछुआरा स्व-भाव ! यही है तुम्हरा कमाल दुस्साहसी जो तुमने क्षण-क्षण सिखलाया नहीं तो सागर-पुत्र ये मछुआरे अपनी फटी कथरियों में धैर्य (तटों) से (बंधे) इतने मालामाल न होते ! कि लोग उनके सामने उनके रक्त के कुल्ले करते अपने हाथ-पाँव धोते और वे सिर्फ़ टुकुर-टुकुर देखते होते !