दयारे-गै़र1 में सोज़े-वतन की आँच न पूछ ख़जाँ में सुब्हे-बहारे-चमन की आँच न पूछ फ़ज़ा है दहकी हुई रक्‍़स में है शोला-ए-गुल जहाँ वो शोख़ है उस अंजुमन की आँच न पूछ क़बा में जिस्म है या शोला जेरे-परद-ए-साज़2 बदन से लिपटे हुए पैरहन की आँच न पूछ हिजाब में भी उसे देखना क़यामत है नक़ाब में भी रुखे-शोला-ज़न की आँच न पूछ लपक रहे हैं वो शोले कि होंट जलते हैं न पूछ मौजे-शराबे-कुहन की आँच न पूछ ‍ फ़ि‍राक आइना-दर-आइना है हुस्ने -निगार सबाहते-चमन-अन्दर-चमन की आँच न पूछ