दास्तान-ए-ग़म-ए-दिल उन को सुनाई गई

बात बिगड़ी थी कुछ ऐसी कि बनाई गई

सब को हम भूल गए जोश-ए-जुनूँ में लेकिन

इक तिरी याद थी ऐसी जो भुलाई गई

इश्क़ पर कुछ चला दीदा-ए-तर का क़ाबू

उस ने जो आग लगा दी वो बुझाई गई

पड़ गया हुस्न-ए-रुख़-ए-यार का परतव जिस पर

ख़ाक में मिल के भी इस दिल की सफ़ाई गई

क्या उठाएगी सबा ख़ाक मिरी उस दर से

ये क़यामत तो ख़ुद उन से भी उठाई गई