
दस्तक हवा ने दी है ज़रा ग़ौर से सुनो
तूफ़ाँ की आ रही है सदा ग़ौर से सुनो
शाख़ें उठा के हाथ दुआ माँगने लगीं
सरगोशियाँ चमन में हैं क्या ग़ौर से सुनो
महसूस कर रहा हूँ मैं कर्ब-ए-शिकस्तगी
तुम भी शगुफ़्त-ए-गुल की सदा ग़ौर से सुनो
गुलचें को देख लेती है जब कोई शाख़-ए-गुल
देती है बद-दुआ कि दुआ ग़ौर से सुनो
ये और बात ख़ुश्क हैं आँखें मगर कहीं
खुल कर बरस रही है घटा ग़ौर से सुनो
शाख़ों से टूटते हुए पत्तों को देख कर
रोती है मुँह छुपा के हवा ग़ौर से सुनो
ये दश्त-ए-बे-कराँ ये Read More! Earn More! Learn More!
