दर्द-ए-दिल पास-ए-वफ़ा जज़्बा-ए-इमाँ होना आदमियत यही है और यही इन्साँ होआ नौ-गिरफ़्तार-ए-बला तर्ज़-ए-फ़ुग़ाँ क्या जानें कोई नाशाद सिखा दे इन्हें नालाँ होना रह के दुनिया में यूँ तर्क-ए-हवस की कोशिश जिस तरह् अपने ही साये से गुरेज़ाँ होना ज़िन्दगी क्या है अनासिर् में ज़हूर्-ए-तर्तीब् मौत क्य है इन्हीं इज्ज़ा का परेशाँ होना दिल असीरी में भी आज़ाद है आज़ादों का वल्वलों के लिये मुम्किन नहीं ज़िन्दा होना गुल को पामाल न कर लाल-ओ-गौहर के मालिक है इसे तुराह-ए-दस्तार-ए-ग़रीबाँ होना है मेरा ज़ब्त-ए-जुनूँ जोश-ए-जुनूँ से बढ़कर नंग है मेरे लिये चाक गरेबाँ होना