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दर्द-ए-दिल पास-ए-वफ़ा जज़्बा-ए-इमाँ होना - बृज नारायण चकबस्त

दर्द-ए-दिल पास-ए-वफ़ा जज़्बा-ए-इमाँ होना आदमियत यही है और यही इन्साँ होआ नौ-गिरफ़्तार-ए-बला तर्ज़-ए-फ़ुग़ाँ क्या जानें कोई नाशाद सिखा दे इन्हें नालाँ होना रह के दुनिया में यूँ तर्क-ए-हवस की कोशिश जिस तरह् अपने ही साये से गुरेज़ाँ होना ज़िन्दगी क्या है अनासिर् में ज़हूर्-ए-तर
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