
चित्रित करके भी राका का शशिमिलनोन्मुख पारावार,
चित्रकार, क्यों व्यक्त न करता उस असीम के भावोद्गार?
इतनी भी क्या तन्मयता, क्या इतना भी बेसुध होना!
खग-कलरव के बिना अवतरित करना ऊषा का सोना
चंचल चतुर चितेरे, चित्रित कर चातक की रट सुकुमार;
तन में मन में बाँध व्यथा की वीणा की व्याकुल झंकार।
तेरी आकृति मेरा स्वर, तव स्वर मेरी आकृति पावे;
मन रजनी के संधि-समय में, इन में विनिमय हो जाव
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