चित चाह अबूझ कहै कितने छवि छीनी गयँदन की टटकी । कवि केते कहैं निज बुद्धि उदै यह लीनी मरालन की मटकी । द्विजदेवजू ऎसे कुतर्कन मे सबकी मति योंहि फिरै भटकी । वह मँद चलै किन भोरी भटू पग लाखन की अँखियाँ अटकी ।