
छप्पर-छप्पर लगे सुलगने, आगबबूला दोपहरी।
लपटी-कपटी राजपाट के मौसम-सी अन्धी-बहरी।
भोरहरे तक चिरई-चुनमुन चिर्रा-चिर्री, चीं-चीं-चीं...
याकि चुनाव चिन-चिन चटके गुर्रा-गुर्री, हीं-हीं-हीं...
साँसें लगीं खींचने फिर से कनबतियाँ गहरी-गहरी।
पत्ता-पत्ता तपे, छाँव के भी तलवे छाले-छाले,
कौन पसीना पोंछे, मन किससे सारा दुख कह डाले,
टस-स
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