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चाँद को रुख़्सत कर दो - अली सरदार जाफ़री

मेरे दरवाज़े से अब चाँद को रुख़्सत कर दो

साथ आया है तुम्हारे जो तुम्हारे घर से

अपने माथे से हटा दो ये चमकता हुआ ताज

फेंक दो जिस्म से किरनों का सुनहरा

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