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चाहिए मुझे मेरा असंग बबूल पन - गजानन माधव मुक्तिबोध

मुझे नहीं मालूम मेरी प्रतिक्रियाएँ सही हैं या ग़लत हैं या और कुछ सच, हूँ मात्र मैं निवेदन-सौन्दर्य सुबह से शाम तक मन में ही आड़ी-टेढ़ी लकीरों से करता हूँ अपनी ही काटपीट ग़लत के ख़िलाफ़ नित सही की तलाश में कि इतना उलझ जाता हूँ कि जहर नहीं लिखने की स्याही में पीता हूँ कि नीला मुँह... दायित्व-भावों की तुलना में अपना ही व्यक्ति जब देखता तो पाता हूँ कि खुद नहीं मालूम सही हूँ या गलत हूँ या और कुछ सत्य हूँ कि सिर्फ मैं कहने की तारीफ मनोहर केन्द्र में खूबसूरत मजेदार बिजली के खम्भे पर अँगड़ाई लेते हुए मेहराबदार चार तड़ित-प्रकाश-दीप... खम्भे के अलंकार!! सत्य मेरा अलंकार यदि, हाय तो फिर मैं बुरा हूँ. निजत्व तुम्हारा, प्राण-स्वप्न तुम्हारा और व्यक्तित्व तड़ित्-अग्नि-भारवाही तार-तार बिजली के खम्भे की भांति ही कन्धों पर रख मैं विभिन्न तुम्हारे मुख-भाव कान्ति-रश्मि-दीप निज के हृदय-प्राण वक्ष से प्रकट, आविर्भूत, अभिव्यक्त यदि करता हूँ तो.... दोष तुम्हारा है मैंने नहीं कहा था कि मेरी इस जिन्दगी के बन्द किवार की दरार से रश्मि-सी घुसो और विभिन्न दीवारों पर लगे हुए शीशों पर प
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