बेगाना हो के बज़्म-ए-जहाँ देखता हूँ मैं

दुनिया के रंग-ओ-बू का समाँ देखता हूँ में

रौशन-ज़मीर जैसे कोई सर्फ़-ए-दीद होए

यूँ जल्वा-हा-ए-कौन-ओ-मकाँ देखता हूँ में

अर्ज़ां है ज़ुल्म-ओ-जौर की उफ़्तादगी मगर

जिन्स-ओ-वफ़ा-ओ-मेहर-ए-गराँ देखता हूँ मैं

इक सम्त जश्न-ए-शादी-ओ-हंगामा-ए-निशात

इक सम्त हश्र आह-ओ-फ़ुग़ाँ देखता हूँ मैं

शरह-ए-अलम दराज़ है अल-क़िस्सा ऐ 'शकील'

इक दाग़ अपने दिल में निहाँ देखता हूँ मैं