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बेचैन जो रखती है तुम्हें चाह किसू की - मोहम्मद रफ़ी सौदा

बेचैन जो रखती है तुम्हें चाह किसू की

शायद कि हुई कारगर अब आह किसू की

उस चश्म का ग़म्ज़ा जो करे क़त्ल-ए-दो-आलम

गोशे को निगह के नहीं परवाह किसू की

ज़ुल्फ़ों की सियाही में कुछ इक दाम थे अपने

क़िस्मत कि हुई रात वो तनख़्वाह किसू की

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