बे-जुम्बिश-ए-अब्रू तो नहीं काम चलेगा

कर मिरे क़िस्से में तिरा नाम चलेगा

ठहरा है मिरे ज़ेहन में जो क़ाफ़िला-ए-गुल

थोड़ा सा तो ले कर यहाँ आराम चलेगा

ज़ुहहाद की माला नहीं जो रात को निकले

रिंदों का पियाला है सर-ए-शाम चलेगा

तू रक़्स करे गिर्द मिरे और मैं गाऊँ

ये खेल भी गर्दिश-ए-अय्याम चलेगा

छुप छुप के जो आता है अभी मेरी गली में

इक रोज़ मिरे साथ सर-ए-आम चलेगा