
बातिल है हम से दावा शायर को हम-सरी का
दीवान है हमारा कीसा जवाहरी का
चेहरा तिरा सा कब है सुल्तान-ए-ख़ावरी का
चीरा हज़ार बाँधे सर पर जो वो ज़री का
मुँह पर ये गोश्वारा मोती का जल्वा-गर है
जैसे क़िरान-ए-बाहम हो माह ओ मुश्तरी का
आईना-ख़ाने में वो जिस वक़्त आन बैठे
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