पौधों में उभरा सीताओं का रूप पछुआ के झोंकों से हिल उठती धूप बैंगनी-सफ़ेद बूटियों की हिलकोर पीले फूलों वाली छींट सराबोर ओस से सनी चिकनी मिट्टी की गंध पाँवों की फिसलन बन जाती निर्बन्ध शब्द-भरी नन्हीं चिड़ियों की बौछार लहराकर तिर जाती आँखों के पार मेड़ के किनारे पगडंडी के पास अनचाहे उग आती अजब-अजब घास इक्का-दुक्का उस हरियाली के बीच कुतरती गिलहरी, फिर-फिर दानें खींच पकने में होड़ किए गेहूँ की बाल बथुए की पत्ती मूंगे जैसी लाल ।