आँख-सी उजली धुली यह रात हिम शिखर पर रश्मियों के पाँव रख कर बढ़ चली कहा मैंने - रुको मैं भी साथ चलता हूँ गगन की उस शांत नीली झील के निस्तब्ध तट पर बैठ कर बातें करेंगे।