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बस एक वक़्त का खंजर मेरी तलाश में है - कृष्ण बिहारी 'नूर'

बस एक वक़्त का ख़ंजर मेरी तलाश में है जो रोज़ भेस बदल कर मेरी तलाश में है ये और बात कि पहचानता नहीं मुझे सुना है एक सितमग़र मेरी तलाश में है अधूरे ख़्वाबों से उकता के जिसको छोड़ दिया शिकन नसीब वो बिस्तर मेरी तलाश में है ये मेरे घर की उदासी है और कुछ भी नहीं दिया जलाये जो दर पर मेरी तलाश में है अज़ीज़ मैं तुझे किस कदर कि हर एक ग़म
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