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बारिश की रुत थी रात थी पहलू-ए-यार था - अहमद नदीम क़ासमी

बारिश की रुत थी रात थी पहलू-ए-यार था

ये भी तिलिस्म-ए-गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार था

कहते हैं लोग औज पे था मौसम-ए-बहार

दिल कह रहा है अरबदा-ए-ज़ुल्फ़-ए-यार था

अब तो विसाल-ए-यार से बेहतर है याद-ए-यार

मैं भी कभी फ़रेब-ए-नज़र का शिकार था

तू मेरी ज़िंदगी से भी कतरा के चल दिय

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