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बनारस : दो शब्दचित्र - रवीन्द्र प्रभात

पिस्ता-बादाम की ठंडई में भांग के सुंदर संयोग से बना-रस एक घूँट में गटकते हुए बनारस गुम हो जाता सरेशाम ’दशाश्वमेध’ की संकरी गलियों में ! और उस वक़्त उसके लिए मायने नही रखती 'गोदौलीया' की उद्भ्रान्त भीड़ शोर-शराबा/ चीख़-पुकार आदि सहजता से मुस्कुराती हिंसा को देखकर मुस्कुरा देता वह भी कि नहीं होता उसे गंगा के मैलेपन का दर्द और "ज्ञानवापी" के विभेद का एहसास कभी भी.......! पसंद करता वह भी ब्यूरोक्रेट्स की तरह निरंकुशता का पैबंद व्यवस्थाओं के नाम पर और मनोरंजन के नाम पर भौतिकता का नंगा नृत्य रात के अंधेरे में ! अहले सुबह घड़ी-घंटों की गूँज और मंत्रोचारण
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