बहार आई गुलों को हँसी नहीं आई

कहीं से बू तिरी गुफ़्तार की नहीं आई

कुछ और वजह है कम हो गई है लज़्ज़त-ए-जाम

हमारी प्यास में कोई कमी नहीं आई

ये काएनात सब आग़ोश-ए-नीम-शब में है

ज़माना हो गया आवाज़ ही नहीं आई

दिल इक दरख़्त-ए-ज़मीं-बोस बाद बाराँ से

रुतें गुज़र गईं कोंपल नई नहीं आई

जाने कैसी घड़ी से गुज़र रहे थे हम

कि जागते रहे नींद भी नहीं आई