तेरी सख्सियत पर क्या लिखू
एक तेरी सख्सियत ही तो है जिसने जिन्दा रखा है अब तक
बचपन ने एक रंगीन सपना देखा था
अमिताभ बच्चन का,
दिन के उजाले में
ब्लैक एंड व्हाइट टीवी की स्क्रीन पर
वो फाइट, वो गाने, वो डांस
नजर नहीं हटती थी ,
इंतजार रहता था शनिवार और इतवार का
दूरदर्शन के उस ज़माने में
कितनी आसानी से मिल लेता मै
अपने सपने से
मगर अब तो टीवी रंगीन हो गयी
सपनो में जंग लग गयी
दूरी इतनी बढ़ गयी की मानो हम परग्रही हो गए
शनिवार और इतवार भी जिंदगी ने उधार ले लिए
दूरदर्शन शांत और टीवी खामोश हो गयी
अब तो बस मुलाकात होती है
कभी कभी बड़ी स्क्रीन पर
कुछ लम्हो के लिए