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बचपन का चेहरा - प्रभुदयाल श्रीवास्तव

चलो किसी ठेले पर चलकर, दोनों खाएँ चना चबेना। आधे पैसे मैं दे दूँगा, आधे पैसे तुम दे देना। झूठ बोलना ठीक नहीं है, लिखा किताबों में है ऐसा। झूठ बोलने वाला हर पल, मन ही मन डरता रहता है | हमने खाई चाट पकौड़ी, अम्मा से सच-सच कह देना। चुरा-चुरा कर रात‌ चाँदनी, फूलों ने भीतर भर ली है। अपनी कंचन निर्मल काया, दुग्ध बरफ जैसी कर ली है।
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