ब-नाम-ए-कूचा-ए-दिलदार गुल बरसे कि संग आए

हँसा है चाक-ए-पैराहन क्यूँ चेहरे पे रंग आए

बचाते फिरते आख़िर कब तलक दस्त-ए-अज़ीज़ाँ से

उन्हीं को सौंप कर हम तो कुलाह-ए-नाम-ओ-नंग आए

हँसो मत अहल-ए-दिल अपनी सी जानो बज़्म-ए-ख़ूबाँ में

चले आए इधर हम भी बहुत जब दिल से तंग आए

कहाँ सेहन-ए-चमन में बात कू-ए-सर-फ़रोशाँ की

इधर से सादा-रू निकले उधर से लाला-रंग आए

करो 'मजरूह' तब दार-ओ-रसन के तज़्किरे हम से

जब उस क़ामत के साए में तुम्हें जीने का ढंग आए