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आया है एक शख़्स अजब आन-बान का - मोहम्मद अल्वी

आया है एक शख़्स अजब आन-बान का

नक़्शा बदल गया है पुराने मकान का

तारे से टूटते हैं अभी तक इधर-उधर

बाक़ी है कुछ नशा अभी कल की उड़ान का

कालक सी जम रही है चमकती ज़मीन पर

सूरज से जल उठा है वरक़ आसमान का

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