आवाज़ में आवाज़ मिलाते ही रहे हम

रोती ही रही रूह सो गाते ही रहे हम

जल उठने में जल बुझने में इक लम्हा लगा था

फिर ख़्वाब सर-ए-दीद उड़ाते ही रहे हम

हर ख़ंदा-ए-बे-ताब था मक़्तूल हमारा

वैसे तो हँसे और हँसाते ही रहे हम