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अवधूत - महेन्द्र भटनागर

लोग हैं - ऐसी हताशा में व्यग्र हो कर बैठते हैं आत्म-हत्या! या खो बैठते हैं संतुलन तन का / मन का! व हो विक्षिप्त रोते हैं - अकारण! हँसते हैं - अकारण! किन्त
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