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आत्मिक आरती (भजन) - अछूतानन्दजी 'हरिहर'

आरति आतम देव की कीजै, ब्रह्म विवेक हृदय धर लीजै॥ परिपूरन को कहँ से आवाहन, सर्वाधार को देउँ कहँ आसन। स्वच्छ शुद्ध कहँ अधरू आचमन, निर्लेपहिं कहँ चंदन लेपन॥ पुष्प कौन जब वे निर्वासन, निर्गंधहिं कस धूप सुगंधन। स्वयं प्रकाश जो आतम चैतन, जोति कपूर है तुच्छ दिखावन॥ पान सुपारी मेवा मिष्
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