सुरभित श्वासों में मर्म-दंश, मृदु चरणों में निष्ठुर प्रयाण, अधरों में मदिरा तीव्र और नयनों में ले विष-बुझे बाण, ढक कोमल-कर के स्वर्णपात्र में भरे हलाहल पर अंचल, सुंदरते, जग-आँगन में आ, कर दिए मनुज तुमने चंचल। अगणित उत्कंठित हृदयों ने विष छीन-छीनकर पान किया, कर रिक्त तुम्हारा पात्र, मरण को, हाय, समझ वरदान लिया। मर्त्यों को कब सर्वस्वार्पण-मद के रहस्य का पार मिला? तुम बढ़ती गईं, विरक्तों की कुटिया का आगे द्वार मिला। मदिरा, निष्ठुरता, बाण, दंश, तुमने दे उन्हें समाप्त किए; कर प्रायश्चित, उनको ठुकरा, उन सबने तुमको शाप दिए। था शेष तुम्हारे प्राणों में जो छिपा हुआ उपहार एक, वह प्रेम-रत्न भी, निर्मोही, ले गए लूट, प्रेमी अनेक। अब अनाभरण, अकलुष, अशस्त्र थीं तुम, सूनी थी पथ-रेखा; कल्याणि, जगाते अलख विजन में तब तुमने कवि को देखा। क्या देतीं? कब चिंता करतीं? था याचक इधर अधीर, प्रिये; बस गईं हृदय में तुम कवि के बन स्वयं अमिट तस्वीर, प्रिये!