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आत्मदान - जगन्नाथप्रसाद 'मिलिंद'

सुरभित श्वासों में मर्म-दंश, मृदु चरणों में निष्ठुर प्रयाण, अधरों में मदिरा तीव्र और नयनों में ले विष-बुझे बाण, ढक कोमल-कर के स्वर्णपात्र में भरे हलाहल पर अंचल, सुंदरते, जग-आँगन में आ, कर दिए मनुज तुमने चंचल। अगणित उत्कंठित हृदयों ने विष छीन-छीनकर पान किया, कर रिक्त तुम्हारा पात्र, मरण को, हाय, समझ वरदान लिया। मर्त्यों को कब सर्वस्वार्पण-मद के रहस्य का पार मिला? तुम बढ़ती गईं, विरक्तों की कुटिया का आगे द्वार मिला। म
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