
सुरभित श्वासों में मर्म-दंश, मृदु चरणों में निष्ठुर प्रयाण,
अधरों में मदिरा तीव्र और नयनों में ले विष-बुझे बाण,
ढक कोमल-कर के स्वर्णपात्र में भरे हलाहल पर अंचल,
सुंदरते, जग-आँगन में आ, कर दिए मनुज तुमने चंचल।
अगणित उत्कंठित हृदयों ने विष छीन-छीनकर पान किया,
कर रिक्त तुम्हारा पात्र, मरण को, हाय, समझ वरदान लिया।
मर्त्यों को कब सर्वस्वार्पण-मद के रहस्य का पार मिला?
तुम बढ़ती गईं, विरक्तों की कुटिया का आगे द्वार मिला।
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