था हमको नहिं यह ज्ञान, आदि-मत हिंद-निवासी थे। टेक विद्या से पता लगाया, गुरुता गौरव दर्शाया। सब दूर हुआ अज्ञान, भुला रहे सत्यानासी थे॥ लिख दी झूठी बदनामी, हा! संकर-बरन हरामी। रच-रच के कथा पुराण, बनाये दासो-दासी थी॥ जन्मे शूद्र-योनि में आकर, पूर्व के फलों को पाकर। कहें हुक्म दिया भगवान, किये यों अँध विश्वासी थे॥ जब जीव अनादि बताया, फिर कौन कर्म फल पाया। तब आदि सृष्टि दरम्यान, न देह कर्मेन्द्रिय वासी थे॥ ईश्वर-अंश जीव अविनासी, चेतन अमल सहज सुखरासी. सब वेद-शास्त्र यों कहें, व्यास वेदांत-विकासी थे॥ बिन देह कर्म नहीं होगा, फिर कहाँ कर्म का भोगा। क्यों जन्मे नीच घर आन, जीव 'हरिहर' अनिवासी थे॥