अब तो दुश्मन भी यार लगता है। दोस्त परवरदिगार लगता है। बात कहने की हो या सुनने की, इतना क्यों ऐतबार लगता है। देखना, ख़ुद को देखना भी क्या, आईना आर-पार लगता है। अपनी फाकाकशी पे हँसता है, वह बड़ा ज़ोरदार लगता है। वक़्त ने इतना दे दिया उसको, जैसे हर दिन उधार लगता है। चाहे ओढ़े-बिछाए जितना भी हर कोई तार-तार लगता है। भूख में, पत्थरों की बारिश में, आसमाँ हरसिंगार लगता है।