बेध दुर्ग नीरव जड़ता का बंधन मुक्त करो ये प्राण, स्वर के उच्च शिखर से, सुंदरि, छेड़ो एक बाण-सी तान। जीवन पथ की अमिट अमावस बने निमिष में स्वर्ण-प्रभात; बिखरा दो उदार अधरों से प्रथम किरण-सा स्मित अवदात। एक अनिंद्य रूप की ज्वाला, देवि, जला दो त्रिभुवन में, जिसमें ‘अशिव’, ‘असत्य’, ‘असुंदर’, हो सब भस्म एक क्षण में। रँग दो मेरे स्वप्न, सजनि, सब, जीवन-मरण अरुण कर दो; जन्म-जन्म का शून्य पात्र यह आज बूँद-भर में भर दो।