अंधरों तुम्हारे मरने की आ चुकी बारी है
कर रहा चिराग़ रोशन होने की तैयारी है
वो भी मतलबी हो जाए इंसान की तरह
कर सकता क़ैद नहीं रोशनी ये लाचारी है
उसके बड़प्पन के चर्चे हो रहे हैं चारों तरफ़
दीदार को अंधेरों ने भी आँखों में रात गुज़ारी है
ग़ुलाम बना चाहता इंसान चिराग़ों को भी
जल जल कर जल रहा दिल उसका भारी है
न जात पात, न अमीर ग़रीब कुछ नहीं देखता
साल दर साल चिराग़ निभा रहा वफ़ादारी है
लड़ता वो लड़ता, तूफ़ानों से भी न डरता वो
काम हवाओं का करना उसकी पहरेदारी है
अंधरों तुम्हारे मरने की आ चुकी बारी है
कर रहा चिराग़ रोशन होने की तैयारी है
वो भी मतलबी हो जाए इंसान की तरह
कर सकता क़ैद नहीं रोशनी ये लाचारी है