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आँखों का था क़ुसूर न दिल का क़ुसूर था - जिगर मुरादाबादी

आँखों का था क़ुसूर दिल का क़ुसूर था

आया जो मेरे सामने मेरा ग़ुरूर था

तारीक मिस्ल-ए-आह जो आँखों का नूर था

क्या सुब्ह ही से शाम-ए-बला का ज़ुहूर था

वो थे मुझ से दूर मैं उन से दूर था

आता था नज़र तो नज़र का क़ुसूर था

हर वक़्त इक ख़ुमार था हर दम सुरूर था

बोतल बग़ल में थी कि दिल-ए-ना-सुबूर था

कोई तो दर्दमंद-ए-दिल-ए-ना-सुबूर था

माना कि तुम थे कोई तुम सा ज़रूर था

लगते ही ठेस टूट गया साज़-ए-आरज़ू

मिलते ही आँख शीशा-ए-दिल चूर चूर

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