आँख में दहशत थी हाथ में ख़ंजर था

सामने दुश्मन था पर दिल में कोई डर था

उस से भी मिल कर हमें मरने की हसरत रही

उस ने भी जाने दिया वो भी सितमगर था

इक पहाड़ी पे मैं बैठा रहा देर तक

शौक़ से देखा करूँ ऐसा भी मंज़र था

हम से जो आगे गए कितने मेहरबान थे

दूर तलक राह में एक भी पत्थर था

रात बहुत देर से आँख लगती थी ज़रा

नींद में कमरा था ख़्वाब में बिस्तर था

शेर तो हम ने बहुत ठीक किया था मगर

अब भी ग़लत था कहीं अब भी बराबर था

सोचा था इस बार तो जा के 'ज़फ़र' से मिलें

क्या करें 'अल्वी' मगर ऐसा मुक़द्दर था