अजब था उसकी दिलज़ारी का अन्दाज़ वो बरसों बाद जब मुझ से मिला है भला मैं पूछता उससे तो कैसे मताए-जां तुम्हारा नाम क्या है? साल-हा-साल और एक लम्हा कोई भी तो न इनमें बल आया खुद ही एक दर पे मैंने दस्तक दी खुद ही लड़का सा मैं निकल आया दौर-ए-वाबस्तगी गुज़ार के मैं अहद-ए-वाबस्तगी को भूल गया यानी तुम वो हो, वाकई, हद है मैं तो सचमुच सभी को भूल गया रिश्ता-ए-दिल तेरे ज़माने में रस्म ही क्या निबाहनी होती मुस्कुराए हम उससे मिलते वक्त रो न पड़ते अगर खुशी होती दिल में जिनका निशान भी न रहा क्यूं न चेहरों पे अब वो रंग खिलें अब तो खाली है रूह, जज़्बों से अब भी क्या हम तपाक से न मिलें शर्म, दहशत, झिझक, परेशानी नाज़ से काम क्यों नहीं लेतीं आप, वो, जी, मगर ये सब क्या है तुम मेरा नाम क्यों नहीं लेतीं