आज जरा खाली पन था 'वारिदपन'...
जो शुष्क हुआ था किसी अविरल चंचल मन से,
जो निश्चल था,
सहज खडा था पर कुछ उम्मीद उडानों की थी
स्वछन्द- गगन- उड जाने की थी किंतु ,
बयार-गति-सन्शय से कुछ दुबका सा था ,
कुछ पीछे सा था निश्चल होकर सोच रहा था,
गर ,
स्पन्दन छोड गया ...?
बीच समर रजनी तट के और...
स्पन्दन छोड गया...
बीच समर उस भीषड के..
ख्वाब -मलिन सच होकर के..
आज तभी खालीपन है ...
उस मन मे जो तब चंचल था.
जो तब दृढ था और अब करुण हुआ.
जो अब निश्चल है पर सहज नही.
विश्वास भरा उम्मीद नही .
ना अनुमान पवन है
ना अब उसमे सन्शय कोई
अब भीषण पवन-बबंडर भी हो उड़ना है
उड जाऊंगा आक्रोश गति जितनी भी होगी
उपर ही तो जाऊंगा