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आह से उपजा गान - जयप्रकाश त्रिपाठी

मेरा दुख लाखो में एक है, किन्तु क्यों कहूँ!

सहने दो, सहने दो और इसे, क्यों नहीं सहूँ! निर्दयता से छीना, जो न
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