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आग है, पानी है, मिट्टी है - कृष्ण बिहारी 'नूर'

आग है, पानी है, मिट्टी है, हवा है, मुझ में| और फिर मानना पड़ता है के ख़ुदा है मुझ में| अब तो ले-दे के वही शख़्स बचा है मुझ में, मुझ को मुझ से जुदा कर के जो छुपा है मुझ में| मेरा ये हाल उभरती हुई तमन्ना जैसे, वो बड़ी देर से कुछ ढूंढ रहा है मुझ में|
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