
आदमी खोखले हैं पूस के बादल की तरह
शहर लगते हैं मुझे आज भी जंगल की तरह
हमने सपने थे बुने इंद्रधनुष के जितने
चीथड़े हो गए सब विधवा के आँचल की तरह
जेठ की तपती हुई धूप में श्रम करते हैं जो
तुम उन्हें छाया में ले लो किसी पीपल की तरह
दर्द है जो दिल का अलंकार, कोई भार नहीं
झील में जल की तरह आँख में काजल की तरह
सोने-चाँदी के तराज़ू में न तोलो उसको
प्यार अनमोल सुदामा के है चावल की तरह
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