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अछूत (पवित्र) होरी - अछूतानन्दजी 'हरिहर'

होरी खेलौ अछूतौ भाई, छुतैरों से छोर छोड़ाई. टेक इनके लोभ फंसे जो भाई, उन्नति कबहूँ न पाई. धोवत धीमर नाई धोती, जूँठनि रहे उठाई. कहौ क्या पदवी पाई, भरम भ्रम-भूत भगाई॥ जिनको नीच म्लेच्छ द्विज कहते, नफरत बहुत कराई. उनको ऊँचे ओहदे पदवी, देत हृदय में डराई. सुविद्या बु
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