
होरी खेलौ अछूतौ भाई, छुतैरों से छोर छोड़ाई. टेक
इनके लोभ फंसे जो भाई, उन्नति कबहूँ न पाई.
धोवत धीमर नाई धोती, जूँठनि रहे उठाई.
कहौ क्या पदवी पाई, भरम भ्रम-भूत भगाई॥
जिनको नीच म्लेच्छ द्विज कहते, नफरत बहुत कराई.
उनको ऊँचे ओहदे पदवी, देत हृदय में डराई.
सुविद्या बु
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