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आबला-पा कोई गुज़रा था जो पिछले सन में

आबला-पा कोई गुज़रा था जो पिछले सन में

सुर्ख़ काँटों की बहार आई है अब के बन में

देखना रंग-ए-बदन यार के पैराहन में

चाँदनी दूध सी छिटकी है मिरे आँगन में

देखना दीदा-वरो आमद-ए-तूफ़ान तो नहीं

टपकी है दर्द की एक बूँद मिरे दामन में

मैं हम-आग़ोश-ए-सनम था मगर पीर-ए-हरम

ये शिकन कैसे पड़ी आप के पैरहन में

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