अब तू हो किसी रंग में ज़ाहिर तो मुझे क्या - उबैदुल्लाह अलीम's image
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अब तू हो किसी रंग में ज़ाहिर तो मुझे क्या - उबैदुल्लाह अलीम

अब तू हो किसी रंग में ज़ाहिर तो मुझे क्या

ठहरे तिरे घर कोई मुसाफ़िर तो मुझे क्या

वीराना-ए-जाँ की जो फ़ज़ा थी सो रहेगी

चहके किसी गुलशन में वो ताइर तो मुझे क्या

वो शम्अ मिरे घर में तो बे-नूर ही ठहरी

बाज़ार में वो जिंस हो नादिर तो मुझे क्या

वो रंग-फ़िशाँ आँख वो तस्वीर-नुमा हाथ

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