
अब तू हो किसी रंग में ज़ाहिर तो मुझे क्या
ठहरे तिरे घर कोई मुसाफ़िर तो मुझे क्या
वीराना-ए-जाँ की जो फ़ज़ा थी सो रहेगी
चहके किसी गुलशन में वो ताइर तो मुझे क्या
वो शम्अ मिरे घर में तो बे-नूर ही ठहरी
बाज़ार में वो जिंस हो नादिर तो मुझे क्या
वो रंग-फ़िशाँ आँख वो तस्वीर-नुमा हाथ
दिखलाएँ नए Read More! Earn More! Learn More!
