अब तौ गुनियाँ दुनियाँ को भजै, सिर बाँधत पोट अटब्बर की॥ कवि 'गंग तो एक गोविंद भजै, कुछ संक न मानत जब्बर की। जिनको हरि की परतीत नहीं, सो करौ मिल आस अकब्बर की॥