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अब मूर्ख बनो! - गोपालप्रसाद व्यास

बन चुके बहुत तुम ज्ञानचंद, बुद्धिप्रकाश, विद्यासागर? पर अब कुछ दिन को कहा मान, तुम लाला मूसलचंद बनो! अब मूर्ख बनो, मतिमंद बनो! यदि मूर्ख बनोगे तो प्यारे, दुनिया में आदर पाओगे। जी, छोड़ो बात मनुष्यों की, देवों के प्रिय कहलाओगे! लक्ष्मीजी भी होंगी प्रसन्न, गृहलक्ष्मी दिल से चाहेंगी। हर सभा और सम्मेलन के अध्यक्ष बनाए जाओगे! पढ़ने-लिखने में क्या रक्खा, आंखें खराब हो जाती हैं। चिंतन का चक्कर ऐसा है, चेतना दगा दे जाती है। इसलिए पढ़ो मत, सोचो मत, बोलो मत, आंखें खोलो मत, तुम अब पूरे स्थितप्रज्ञ बनो, सच्चे संपूर्णानन्द बनो । अब मूर्ख बनो, मतिमंद बनो! मत पड़ो कला के चक्कर में, नाहक ही समय गंवाओगे। नाहक सिगरेटें फूंकोगे, नाहक ही बाल बढ़ाओगे । पर मूर्ख रहे तो आस-पास, छत्तीस कलाएं नाचेंगी, तुम एक
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