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अब हर्फ़-ए-तमन्ना को समाअत न मिलेगी - पीरज़ादा क़ासीम

अब हर्फ़-ए-तमन्ना को समाअत मिलेगी

बेचोगे अगर ख़्वाब तो क़ीमत मिलेगी

तशहीर के बाज़ार में ताज़ा ख़रीदार

ज़ेबाइशें मिल जाएँगी क़ामत मिलेगी

लम्हों के तआक़ुब में गुज़र जाएँगी सदियाँ

यूँ वक़्त तो मिल जाएगा मोहलत मिलेगी

सोचा ही था यूँ

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