
अब हर्फ़-ए-तमन्ना को समाअत न मिलेगी
बेचोगे अगर ख़्वाब तो क़ीमत न मिलेगी
तशहीर के बाज़ार में ऐ ताज़ा ख़रीदार
ज़ेबाइशें मिल जाएँगी क़ामत न मिलेगी
लम्हों के तआक़ुब में गुज़र जाएँगी सदियाँ
यूँ वक़्त तो मिल जाएगा मोहलत न मिलेगी
सोचा ही न था यूँ
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