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अब अहल-ए-दर्द ये जीने का एहतिमाम करें

अब अहल-ए-दर्द ये जीने का एहतिमाम करें

उसे भुला के ग़म-ए-ज़िंदगी का नाम करें

फ़रेब खा के उन आँखों का कब तलक दिल

शराब-ए-ख़ाम पिएँ रक़्स-ए-ना-तमाम करें

ग़म-ए-हयात ने आवारा कर दिया वर्ना

थी आरज़ू कि तिरे दर पे सुब्ह शाम करें

माँगूँ बादा-ए-गुल-गूँ से भीक मस्ती की

अगर तिरे लब-ए-लालीं मिरा ये काम करें

देखें दैर हरम सू-ए-रह-रवान-ए-हयात

ये क़ाफ़िले तो जाने कहाँ क़याम करें

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