आँखों से अब लहू बहता नहीं है,
दर्द होता है, मगर वो कहता नहीं है।
ये घर बड़ी ही मुश्किलों से बना था,
हालाँकि, अब यहाँ कोई रहता नहीं है।
हमारे बुज़ुर्गों ने सारा अमृत चूस डाला,
कोई नदी नाला, यहाँ बहता नहीं है।
घर से दूर रहकर चिड़चिड़ा हो गया है,
इस सब में उसकी कोई ख़ता नहीं है।
मोहल्ले में किसी से भी बनती नहीं है,
जवान ख़ून है, बात ग़लत सहता नहीं है।
उसकी हिम्मतें कई पर्वत चड़ चुकी हैं,
वो एक सम्मान है मेरा, हता नहीं है।
-कवि पुनीत