वो गुँथी हुई चोटी तेरी, वो लाली वाले गाल;

वो काजल वाली गहरी आँखें, वो चूड़ी हरी और लाल।

वो गेहूँ के, गन्ने के खेत, और सरसों के बाग़;

वो प्याल वाला मख़मली गद्दा, वो सोने बाली टाल।

वो लम्बा चौड़ा आँगन, गीले चूल्हे की गन्ध;

वो चावल के आँटे की रोटी, वो पीतल वाला थाल।

वो ईद की मीठी सेंवई, दीवाली का महताब;

वो बैशाखी के भंगड़े, वो होली वाला, अबीर, गुलाल।

"वो घर की सारी बातें, परदेस में करना याद;

वो हर बार का ख़ुद से वादा, घर जाऊँगा इस साल।

-  Kavi Puneet (15th June,2017)

(c) Puneet Agarwal