जज़्बात है ज़्यादा के अल्फ़ाज़ कम है, ना शब्द जुबाँ पे ना आँखे नम है। है वक़्त का ये बोझ या उम्र का तकाज़ा है, हमसे हमारी ही बातें कम है।